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Saturday, June 20, 2009


कहाँ से आई बातें खुदा की

कि सागर से कोई हीरा मिला है।

सागर नयन किसी के अब हँस के आँखें ही रों ई ,

कोई गीला गिला है।

तीन मर्तबा सिजदे में , था करता तेरी बड़ाई।

तेरी जो कि खुदाई, उनसे हुई जुदाई।

यादों में आज उनकी , कतरा यूँ ही गिरा है।

सिजदे में गिर के सर ये ऊपर नहीं उठा है।

अरसा में खुदी पकड़कर पग को थमा रखा था।

जुदा होकर जुदाई से मैं ख़ुद से जुदा हुआ था।

जुदाई को फिर से मैंने भूलों से छु लिया है।

ख़ुद का फ़साना अब तो किस्मत को दे दिया है।

कहाँ से आईं बातें खुदा

की कि सागर से कोई हीरा मिला है।

सागर नयन किसी के,

अब हँस कर आँखें ही रोई,

कोई गीला गिला मिला है।

मैं आम रहना चाहता हूँ

मैं आम रहना चाहता हूँ।
न कोई महानशख्सियत
के जन मूर्त बना पूजा करें।
मैं आम रहना चाहता हूँ
न कोई महानशख्सियत
कि गाँधी सम लोग थूका करें।
मैं आम रहना चाहता हूँ
न कोई महानशख्सियत
कि तारीफ़ मिले सिर झुका करे।
मैं आम रहना चाहता हूँ
न कोई महानशख्सियत
कि कर सकूं खता, ज़माना जुबान खोला करे।
मैं आम रहना चाहता हूँ
न कोई महानशख्सियत
कि खुदगर्ज़ माता- पिता छोड़ा करे।
मैं आम रहना चाहता हूँ
न कोई महानशख्सियत
कि परहित में निज को तोडा करे।
मैं आम रहना चाहता हूँ न कोई महानशख्सियत
यूँ नहीं कि डर लगता है प्रतिस्पर्धा से!
मैं आम रहना चाहता हूँ न कायर किरदार कोई
कि गला काट ,,, में; इंसानियत निचोडा करे।
-इरफान

Thursday, June 18, 2009

मैं शब्दों का मारा हूँ ..

मैं शब्दों का मारा हूँ
किस्मत का नहीं,
लातों का नहीं।
घायल अन्दिल्हा हूँ,
सरकारी भवन ज्यों।
हाथ टूट कर जुड़ जाता है;
शस्त्र का जख्म भर जाता है;
शब्द का फूल,
ज़रा सा फूल
बनकर शूल
मर्ज़ की धूल
भूल ही भूल
में हवा हो जाता है।
घुलता हूँ भीतर ही भीतर
मुझ अहमक को मकबूल।
अपनों से दूर ,
गगन को घूर,
किता मंज़ूर,
दिल गो चूर।
जग का दस्तूर -
निज गैर हुआ जाता है।
मैं शब्दों का मारा हूँ
किस्मत का नहीं,
लातों का नहीं।
घायल अनदिखा हूँ
सरकारी भवन ज्यों।
-इरफान

दब गई सिसकी

दब गई सिसकी
सिसक सिसक कर,
गर्भ में साँसे
खिसक खिसक कर
देतीं हैं दम तोड़।
गर्भ कब्र बन जाती है;
मुर्दा कब्र बोलती है-
मैं थी ।
आज नहीं; कल
दब गई सिसकी
सिसक सिसक कर।
लीला सृष्टा की तो दृष्टा देख
सिसकी पर सिसकी,
कब्र पर कब्र,
कत्ल पर कत्ल।
उसकी कब्र पर
पट गईं अनगिन कब्र।
मैं थी आज नहीं, कल
दब गई सिसकी
सिसक सिसक कर।
--इरफान

Monday, June 15, 2009

बस मैं ही जानता हूँ

बस मैं ही जानता हूँ
दर्द!
चिथडों में गीली हो गई
गर्द!
आंत लिए कोई हाथों में
प्राण पकड़ कोई आँहों में
इक पल को सुन्न धमाका
और फिर...! लाशें!
थमी हवा और; ज़मीन हो गई
ज़र्द!
ख़ुद मेरी है उनसे
अर्ज़!
नया जिहाद है अब
मर्ज़!
कहाँ आत्मरक्षा , बचाव दीन का
अब नफरत, सिर्फ़ नफरत
तुम अपने बचपन से मजबूर
वह अपने।
जो बचपन में दिया
वो जवानी में फूटेगा
बेगुनाहों को देने वाले
दर्द!
ख़ुद को कहलाते हैं
मर्द!
बस मैं ही जानता हूँ
दर्द!
चिथडों में गीली हो गई
गर्द!



























डूब कर खिला हूँ

डूब कर खिला हूँ
मैं गम के दरिया में।
अधर पर रक्त है उसका
नयनों में है बाउचर।
खुशियाँ छूते ही बरक्स
पा जाता हूँ ताज़ा इतहास।
डूब कर खिला हूँ
मैं गम के दरिया में।
हाथ जोड़ते ही सिजदे की याद आती है।
ईश नाम सुनते हिराब की याद आती है।
देखते ही अनजानों को अपनों की याद आती है।
कब बीत चला वक्त, दो लकीरें बह जाती हैं,
जब कौर टूटते ही कर-सुगंध की याद आती है।
बुरका देख कर क्यूं बस मान की ही तस्वीर छाती है।
स्मृतियाँ सुहानी क्यों मन पर ही इठलाती हैं।
देख चाँद ईद का, खुशियाँ यह कह जाती हैं-
डूब कर खिला तू गम के दरिया में।
खिलकर गम में भी मुस्काना।
दरिया बढे तो हंस जाना। रुके तो कहना-
डूब कर खिला हूँ
मैं गम के दरिया में।

आना यहीं पड़ा

है क्या यहाँ?
इक चुप में कलोल
पंछी का,
कलरव खुशियों का
या मदमस्त पवन का।
मुझ्कोतो अंत ललिताता
लगे सुहाया अम्बर का।
गम से नाता दिल का है
सो आना यहीं पड़ा।
नाता छोर पर अम्बर के
लगे लाली में मैं भी जादा।
सागर तट पर खड़ा-खड़ा
क्यूं मन भी है इत रुका-रुका
सुख से डर नहीं न गम से
जहाँ सुर जुड़े सरगम से चाहूँ एक जग ऐसा जित
सुख हो न गम।
गम सी प्यार यूँ है के
गम से आगे शून्य है।
कहीं दीखता है यहीं
सो आना यहीं पड़ा.